सोमवार, 2 मार्च 2009

हरियाली तीज

हरित वर्ण साटिका-पर्ण में, लिपटा हुआ गुलाब ।
भरा-भरा सा वदन तुम्हारा, बिल्कुल लाजबाब ॥

हरियाले सावन का रंग, कंगन की हरियाली ।
खग की चहक खनक में इसकी, मस्तानी- मतवाली ॥

हरे रंग का टीका, चेहरे पर खूब सजा है ।
कर रहा इशारे में प्रेम की, दिल से आज रज़ा है ॥

ऊपर से नीचे तक तुम पर, हरे रंग का राज।
इस हरियाली में खो जाए ,मेरा रंग भी आज॥
( साटिका = साड़ी)
गंगा धर शर्मा "हिंदुस्तान"

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शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

आजादी की चाह नहीं

आजाद-दिवस है, पर आज मुझे आजादी की चाह नहीं।
उस जुल्फ जल ने जकड़ लिया , अब उड़ने की परवाह नहीं॥


जो आजादी का शंख फूंकते , उन कवियों का आह्वान।
कुंतल कारा का तोड़ बने जो , रचें एक भी ऐसा गान॥
मुझको तो अब अहसास हुआ
उलझन अलकों की ऐसी है।
वीणा-पाणि का पुत्र कवि भी, पा सकता जिसकी थाह नहीं।
आजाद-दिवस है, पर आज मुझे आजादी की चाह नहीं


जब केश-पाश में जकड़ चुका ,तब बंधन-सुख परिचय पाया।
तृषित-तप्त जीवन में लहराए, बन कर मेघ-घटा छाया ॥
व्याकुल उर की प्यास बुझेगी महकेगी अब मन की बगिया।
श्यामल-सावन को छोड़ सकूँ , मुझमें ऐसा उत्साह नहीं॥
आजाद-दिवस है, पर आज मुझे आजादी की चाह नहीं


भूल-भूलैया में बालों की मेरा सब चिंतन खो जाए।
सुलझाने में इनकी उलझन , पूरा सब जीवन हो जाए॥
कस्तूरी कच-गंध-महक से
मन-मानस संतृप्त हो चुके।
जो इस वन से बहार जाए, वो मुझे चाहिए राह नहीं॥
आजाद-दिवस है, पर आज मुझे आजादी की चाह नहीं


प्रकृति की समस्त उपमाएं , उस एक वदन में विद्यमान ।
सरल नयन में गहरा सागर, तिरछी चितवन में तूफ़ान॥
दशन-द्युति में चपला चमके
भौहों में खिंचता शक्र-चाप।
अधर ओस से बढ़ कर पावन, आह ! होती तृप्त निगाह नहीं॥
आजाद-दिवस है, पर आज मुझे आजादी की चाह नहीं



गंगा धर शर्मा "हिंदुस्तान"

हाथों में तेरा चेहरा हो

सन्दर्भों को छोड़ प्रिये , ! आसमान के पर चलें
ना डोली की रहे जरूरत , ना संग कोई कहार चले


वहां चंद्र होगा, बस तेरा आनन होगा
नील गगन की जगह तुम्हारा, लहराता दामन होगा


सृष्टी का मतलब बस 'मैं और 'तुम ' होंगें
तेरी जुल्फों के साये में, मीठे सपनों में गुम होंगे


मलय-समीर नहीं होगा, बस तेरी खुशबू होगी
हर और बस एक शय , 'तू ' केवल 'तू' होगी


कर जब जिस और बढाऊंगा
तेरा स्पर्श कर पाऊँगा


रफ्तार वक्त की थम जाए, हाथों में तेरा चेहरा हो
मेरा विश्वास तुम्हारी बिंदिया , तेरा प्यार ही सेहरा हो


बस हमारी चाहत हो,
और कुछ भी तो हो
बाह्य अलंकारों का आडम्बर , सारा यहीं उतर चलें
सन्दर्भों को छोड़ प्रिये, आसमान के पर चलें


गंगा धर शर्मा "हिंदुस्तान"

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पूर्ण निमीलित नेत्रों के नाम

पद्म पलाश उत्फुल्ल दृगों का निमिलन
सरसिज का हो ज्यों मधुपालिंगन


आकाशाचारी उन्मुक्त पथिक को पकड़ लिया है
दुर्विनीत द्विरेफ जो पंखुरियों में जकड़ लिया है
कौमुदी मदिर पवन से कहती
है तो बंधन, पर कितना पावन


अली-कली संसर्ग स्वप्न में, बीत चुके जो क्षण हैं
प्रेम-समर-सीकर-बिन्दु बन, झलके तुहिन के कण हैं
अलस-पलक में बंद भ्रमर भी,
आः! नहीं करता अब मुक्ति-जतन


अंशुमाली ने आँखे खोल, जिस पल जग को हेरा
रमणी-श्यामा-पद्मा को, लाज भाव ने घेरा
हौले से ,अति मंद स्मित करके
तब झटपट खोले हैं कंज नयन


पद्म पलाश उत्फुल्ल दृगों का निमिलन
सरसिज का हो ज्यों मधुपालिंगन

गंगा धर शर्मा "हिंदुस्तान"

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धीरज तनिक धरो

, मधुमुखी सयानी !
थोड़े दिन की बात रह गई
फिर प्रेम ऋतू आनी
सच है सही नहीं जाए, भीषण ज्वाला तन की
मचल-मचल कर मर जाती, हर एक तमन्ना मन की
अरी, वासंती प्रिये!
धीरज तनिक धरो, बरसेगा
तपन शमन हित पानी
बंधन मुक्त करो , उड़ने दो अलकों का बादल
नयनों की चंचलता पर , रहे नियंत्रण दो पल
यि, संगिनी जीवन की!
आकुल बनो, गगन कह रहा
घटा जामुनी छानी

गंगा धर शर्मा "हिंदुस्तान"

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तुम्हारे लिए

गर तू कहे तो ये काम कर दूँ
नीलाम ख़ुद को बेदाम कर दूँ ।।
ताजिंदगी गम होगा कोई,
जिंदगी ये तुम्हारे मैं नाम कर दूँ।।

गंगा धर शर्मा "हिंदुस्तान"

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प्रगति

जनबी थे, अब बात होने लगी है
नीले अम्बर में अवनी खोने लगी है । ।
तारों ने देखा उन्हें तो यूँ बोले,
अब चमक चाँदनी की भी खोने लगी है । ।


गंगा धर शर्मा "हिंदुस्तान"